ज्ञान – विज्ञान

प्रश्न कुण्डली- बिना जीवन कुण्डली के जाने

इस लेख के माध्यम से मैं आप सभी को बताना चाहता हूं कि प्रश्न कुंडली एक बहुत ही अच्छा तरीका है जब किसी इंसान के पास कुंडली ना हो और उसके पास कोई एक खास सवाल हो तो इस सवाल का जवाब देने के लिए सबसे अच्छा तरीका प्रश्न कुंडली होता है

प्रश्न कुंडली किस तरह काम करती है अगर प्रश्न करने वाला व्यक्ति दिल से ईमानदारी से साफ साफ सवाल पूछता है तो जिस वक्त वह सवाल पूछता है उस वक्त की सभी ग्रहों की स्थिति कुछ इस तरह बनती है कि उनकी वाइब्रेशन उनकी एनर्जी प्रश्नकर्ता के सवाल की एनर्जी के साथ मैच करने लगती है और इसी वजह से प्रश्नकर्ता भी उसी वक्त सवाल करता है।

जब लगन उस सवाल के समकक्ष चल रहा हो इसी वजह से प्रश्न कुंडली हमेशा ऐसे ही बनती है जैसा सवाल पूछा गया है प्रश्न कुंडली में हमेशा सबसे ज्यादा इस बात का ध्यान रखा जाता है की लग्नेश और लग्न क्या है, लग्न चर और उसकी दिशा आदि, जो भी बहुत सारी बाते हमने बेसिक एस्ट्रोलॉजी में राशियों के बारे में पढी, वो सभी बाते यहाँ काम आती है।

1• सामान्य प्रश्न विचार :- प्रश्न ज्योतिष से प्रश्न कर्ता जब प्रश्न करता है उसी समय का लग्न बनाकर प्रश्नों का उत्तर दे तो काफी हद तक जो व्यक्ति अभी नया नया ज्योतिष पढ़ रहा हों और ज्यादा अनुभव नहीं भी हों तो भी प्रश्नों का उत्तर निकाल सकता है।

सबसे पहले जब यह निकलना हो उस समय कि कुंडली बना ले | जो भी लग्न चल रहा हों उस लग्न का स्वामी लग्नेश व जिस भाव के लिए प्रश्न किया गया हों वो कार्येष कहलाता है क्रमश: उन दोनों ग्रहों कि जाती, गुण,अवस्था कि जानकारी कर इष्ट फल बताये |

लग्नेश कार्येष अपने अपने भाव में स्थित हों या कार्येष लग्न में हों लग्नेश कार्य भाव में हों तो वांछित सिद्धी मिलती है परन्तु इनमेसे कोई भी एक भाव पर चंद्रमा कि पूर्ण दृष्टि हों तो कार्य पूर्ण रुप से सिद्ध होता है।

अगर एसी स्थिति में इन पर चंद्रमा नहीं देख रहा हों परन्तु और कोई शुभ ग्रह देखता हों तो यह कार्य तो सिद्ध नहीं होगा परन्तु कोई अन्य कार्य कि सिद्धी होगी |

2• प्रश्नकर्ता सीधा है या कुटिल :- लग्न में चंद्रमा व केतु , {१ ४ ७ १० } शनि हों , बुद्ध अस्त हों चंद्रमा मंगल या शनि पूर्ण दृष्टि से देखते हों तो प्रश्न कर्ता कुटिल है वह ज्योतिषी कि परीक्षा लेने आया है या ज्योतिषी कि मजाक बनाने आया है। जैसा की अक्सर लोग फ्री के नाम पर आते है और ज्योतिषी का वक़्त खराब करते है।
इसलिए आप पृश्नकृता के पृश्न किये बिना भी पृश्न कुंडली बना सकते है। अगर लग्न में शुभ ग्रह हों तो प्रश्नकर्ता सरल व्यक्ति है उसको वाकई अपना भविष्य जानना है |

यदि चंद्रमा , गुरु लग्न या सप्तम स्थान को मित्र दृष्टि से देखते हों तो भी प्रश्नकर्ता सरल स्वभाव का है परन्तु प्रश्न के समय गुरु और चंद्रमा कि शत्रु द्रष्टि सप्तमेश पर हों तो कुटिल है। अगर चंद्रमा व गुरु एक राशी में हों तो प्रश्नकर्ता सरल व्यक्ति है |

3• वर्तमान,भूत या भविष्य कैसा :- यदि चंद्रमा और गुरु का योग सप्तमेश के साथ हों तो प्रश्नकर्ता का वर्तमान समय ठीक है और आगे भी ठीक होगा | यदि ऐसा नहीं है तो वर्तमान भी ठीक नहीं है आगे भी ठीक नहीं होगा |

इसी में लग्नेश व कार्येष का योग जिस दिन हों और कार्येष उदय होकर लग्न में पंहुचे या कार्येष और लग्नेश कि परस्पर दृष्टि हों उसी दिन कार्य होगा | इस तरह से मोटे तोर पर कार्य होगा या नहीं , होगा तो कब होगा यह छोटी छोटी भविष्य वाणी थोड़े से अध्ययन से कि जा सकती है |

मतलब ये सबसे सामान्य नियम है। मेरी आप से विनती है, की आप जब खुद इसकी अभ्यास करेंगे, तो ज्यादा समझ पाएंगे।

Contact Lens (कॉन्टैक्ट लेन्स) आइए जानें!

कॉन्टैक्ट लेंस आंख के गोले के ऊपर फिट किया जाता है, यह आमतौर पर दृष्टि दोषों को ठीक करने के लिये प्रयोग किये जाते हैं।

चिकित्सकों द्वारा बनाया गया सॉफ्ट लेंस का उपयोग अक्सर आंख के गैर-अपवर्तक विकारों के उपचार और प्रबंधन में किया जाता है। एक पट्टी संपर्क लेंस रोगी को पलक झपकने की लगातार रगड़ से घायल या रोगग्रस्त कॉर्निया की सुरक्षा करते हुए देखने की अनुमति देता है, जिससे वह ठीक हो सकता है। दृष्टि स्थितियों के उपचार में किया जाता है ।

जलस्फोटी keratopathy, सूखी आंखें, कॉर्निया खरोंच और कटाव, स्वच्छपटलशोथ, कॉर्निया शोफ, descemetocele, कॉर्निया विस्फारण, मूरेन के अल्सरपूर्वकाल कॉर्नियल डिस्ट्रोफी, और न्यूरोट्रोफिक केराटोकोनजैक्टिवाइटिस। कॉन्टेक्ट लेंस जो आंखों तक ड्रग्स पहुंचाते हैं, उन्हें भी विकसित किया गया है।

दोषों को ठीक करने के लिये कन्टैक्ट लेन्सों का सबसे पहले सन् 1887 में ए.ई. फिक ने विकास किया था।

आरम्भ में ये लेंस कांच को ब्लो करके या ग्लास की टेस्ट ट्यूब की तली को घिस कर और पालिश करके बनाये जाते थे। पहले ये लेंस सफल नहीं हुए और कुछ दिनों तक ये केवल चर्चा का विषय ही बने रहे।

कुछ समय पाश्चात, इस विषय में सार्थक प्रगति 1938 में हुई जब मिथाइल मेथाक्रलेट (methyl methacrylate) जैसे प्लास्टिक से बने कन्टैक्ट लेन्स विकसित किए गए।

1938 से 1950 तक आंखों की छाप लेकर और उसका मोल्ड बनाकर अनेक कन्टैक्ट लेंस बनाये जाते रहे। ये लेंस आंख के सम्मुख भाग को पूरी तरह ढक लेते हैं और इसके लिए इनके नीचे एक तरल पदार्थ का प्रयोग किया जाता है।

1950 के बाद छोटे लेंस तैयार होने लगे जो केवल कार्निया (cornea) को ही ढकते थे। ये एक तरह से आंसुओं की एक तह पर तैरते हैं।

इस लेंस के लिए आंख की छाप लेने की जरूरत नहीं है, क्योंकि कार्निया का नाप उपकरणों से लिया जा सकता है। इन लेंसों का व्यास सामान्य तौर पर 7 से 11 मिमी. और इनकी मोटाई 0.1 से 1 मिमी. तक होती है। ये पूरे दिन बिना हटाये पहने जा सकते हैं।

कन्टैक्ट लेंस फिट करने से पहले आंख का परीक्षण किया जाता है। यह परीक्षण ठीक उसी प्रकार से किया जाता है, जिस प्रकार से चश्मा लेने से पहले कराते हैं।

फिर “कराटोमीटर” नाम के उपकरण से पुतली का कर्वेचर (curvature) नाप लिया जाता है। लेंस के व्यास और शक्ति का निर्णय हो जाने पर इसी नाप और शक्ति का लेंस निर्मित कर लिया जाता है।

कन्टैक्ट लेंस बनाने के लिए पहले प्लास्टिक को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है। इन टुकड़ों को खराद पर चढ़ा कर बटन की शक्ल की गोलियां बना ली जाती हैं। इनको बोनेट कहते हैं।

तब मशीनों की मदद से इनको अलग-अलग शक्ति देने के लिये वांछित गोलाई दी जाती है, अन्त में इन पर पालिश कर दी जाती है। इसके बाद लेंस को आंख पर लगा कर देखा जाता है कि वह सही बैठता है या नहीं। सही होता है तो आंख पर लगा लिया जाता है।

अभ्यास करने पर इस लेंस को लगातार बारह घंटों तक आंखों पर लगाये रखा जा सकता है। पुतली पर चढ़ा कन्टैक्ट लेंस दूसरे व्यक्ति को दिखाई नहीं देता। इस गुण के अतिरिक्त यह सामान्य चश्मे से बहुत अधिक विस्तृत दृश्य-विस्तार प्रदान करता है।

खेल-कूद में भी ये बहुत उपयोगी सिद्ध होते हैं, क्योंकि न ये आसानी से खोते हैं न टूटते हैं । इनसे तेज धूप से भी व्यक्ति की रक्षा होती है, पहले ये आंख की बीमारियों में ये काम नहीं आते थे पर वर्तमान में ये आँख की कई समस्यायों के निदान मे काम आने लगे हैं। ये महंगे अधिक होते हैं और कुछ लोगों को इन्हें लगाने में परेशानी भी होती है।

विज्ञान ने पहले से छोटे और अधिक लचकदार लेंस खोज निकाले हैं। सातवें दशक के प्रारम्भ से हाइड्रोक्सी-इथाइल मेथाक्रिलेट (hydroxy-ethyl methacrylate) से मुलायम कन्टैक्ट लेंस बनाये जाने लगे हैं, जो पहनने में अपेक्षाकृत अधिक आरामदेह होते हैं।

कॉन्टैक्ट लेंस लगाने का तरीका

कॉन्टेक्ट लेंस आम तौर पर अवतल पक्ष के साथ सूचकांक या मध्य उंगली के पैड पर रखकर आंख में डाला जाता है और फिर उस उंगली का उपयोग करके लेंस को आंख पर रखा जाता है।

कठोर लेंस को सीधे कॉर्निया पर रखा जाना चाहिए। मुलायम लेंस को श्वेतपटल (आंख का सफेद) पर रखा जा सकता है और फिर जगह पर स्लाइड किया जा सकता है। एक ही हाथ की दूसरी उंगली, या दूसरे हाथ की एक उंगली, का उपयोग आंख को चौड़ा रखने के लिए किया जाता है।

वैकल्पिक रूप से, उपयोगकर्ता अपनी आँखें बंद कर सकते हैं और फिर अपनी नाक की ओर देख सकते हैं, लेंस को कॉर्निया के ऊपर जगह में सरका सकते हैं। समस्या तब उत्पन्न हो सकती है यदि लेंस फोल्ड हो जाता है, समय से पहले अंदर-बाहर हो जाता है, उंगली को बंद कर देता है, या आंख की सतह की तुलना में उंगली को अधिक कसकर पालन करता है। समाधान की एक बूंद लेंस को आंख से चिपकने में मदद कर सकती है।

Fool’s Gold झूठा-सोना

झूठा सोना ( Fool’s Gold ) किसे कहते हैं ? ‘ झूठा सोना दरअसल प्रकृति से प्राप्त होने वाला एक खनिज है । इसे आयरन डाइसल्फाइड़ या आइरन पाइराइट कहते हैं, यह रत्न की श्रेणी मे भी आता है। यह पीतल जैसी पीले रंग की चमकदार धातु होती है, इसलिए कभी-कभी इसे देखकर सोने का भ्रम हो जाता है, और यही कारण है कि इसका नाम ‘झूठा सोना’ पड़ा है। इसे माक्षिक भी कहते हैं।

पाइराइट्स सोने से बहुत सख्त और भुरभुरा होता है , इसीलिए उसे अलग पहचाना जा सकता है । पाइराइट शब्द ग्रीक भाषा के पाइर ( pyr ) शब्द से बना है , जिसका अर्थ है आग ( fire ) । वास्तविकता तो यह है कि पाइराइट जब लोहे से टकराता है तो इसमें से आग की चिंगारियां निकलती हैं। पाइराइट के जले हुए अंश प्रागैतिहासिक काल के कब्रिस्तानों में पाये गये हैं । इससे स्पष्ट होता है कि आदिम युग में इस पदार्थ को आग जलाने के काम में लाया जाता था ।

झूठा- सोना

कला ( Art )

‘कला’ शब्द भारतीय साहित्य में प्राचीन काल से प्रयुक्त होता रहा है। ‘कला’ शब्द ‘कल’ धातु से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है ‘सुन्दर’। ‘कला’ शब्द में ‘ला’ धातु भी लगती है जिसका अर्थ है ‘प्राप्त करना’ । अर्थात् कला का अर्थ है ‘सुंदर को प्राप्त करना’ । अतः कला वह मानवीय क्रिया है , जिसका विशेष लक्षण ध्यान दृष्टि से देखना , चिंतन करना , संकलन करना , स्पष्ट रूप से प्रकट करना है । ‘कला’ शब्द के प्रर्यायवाची के रूप में ‘शिल्प’, आर्ट तथा ‘कौशल’ शब्दों का प्रयोग भी होता रहा है ।

मानव मूलतः सौंदर्य का प्रेमी रहा है । अपने जीवन के हर क्षेत्र में मानव सुन्दरता की कामना करता है । मानव की इसी सौंदर्य भावना से कला का जन्म हुआ । प्राकृतिक सौंदर्य से प्रभावित होकर मानव ने सुंदर कलाकृतियों का निर्माण किया । मानव जब अपने भावों को व्यक्त करने के लिए किसी माध्यम का प्रयोग करता है तो कला का सृजन आरम्भ होता है । कला मानव का अनुभव है । वह उसके विचारों , भावों आदि को व्यक्त करने का एक माध्यम है । सभी मानवीय क्रियाएँ जो सृष्टि में होती हैं कला कही जाती है । मानव अपने मन – मस्तिष्क तथा शरीर से जो कार्य करने की चेष्टा करता है वह ही कला है । अतः जिस कृति का सृजन मानव करता है , वह कला है ।

कला मानव के भावों तथा विचारों को प्रकट करने का माध्यम है । मानव का यह स्वभाव है कि वह नई – नई वस्तुओं के विषय में जानने के लिए उत्सुक रहता है . ज्ञान की प्राप्ति कई प्रकार से करता है , नवीन वस्तुएं बनाता है । मानव के हर कार्य को कला की संज्ञा दी गई है । अतः मानव जो भी कार्य करता है वह कला है । कला एक क्रमिक विकास है । इसके चार चरण हैं |

1. सबसे पहले आंतरिक इच्छा का होना ।

2. इस इच्छा को पूरा करने की पूर्ण चेष्टा करना ।

3. इच्छा , चेष्टा तथा क्रिया से ही कलाकृति का जन्म होना ।

4. कलाकृति से दर्शक पर पड़ने वाला प्रभाव ।

कला का क्षेत्र व्यापक है। हर विद्वान ने अपने-अपने आधार पर कला को वर्गीकृत किया है। मुख्य रूप से मानव शरीर के मन तथा-मस्तिष्क के आधार पर ही कला के वर्गीकरण किए गए हैं । परन्तु अधिकतर व्यक्ति बुद्धि को ही सर्वाधिक महत्व देते हैं । इसी आधार पर कला को दो वर्गों में बाँटा गया है ।

1. यांत्रिक कलाएँ

2. ललित कलाएँ

1. यांत्रिक कलाएँ – उपयोगी कलाएं यांत्रिक कलाएँ कहलाती हैं । ये कलाएँ मानव जीवन के लिए उपयोगी होती है । ये भौतिक सुख प्रदान करती है । इन्हीं कलाओं के द्वारा हमें दैनिक जीवन की आवश्यकता की चीजों की प्राप्ति होती हैं । इन कलाओं में उद्देश्य की पूर्ति के अनुसार ही कल्पना शक्ति का प्रयोग होता है । जैसे एक मिस्त्री कुर्सी बनाते उसे कुछ भी आकृति दे सकता है पर वह यह बात हमेशा ध्यान में रखता है कि कुर्सी का प्रयोग सही रहे अर्थात् वह बैठने में आरामदायक हो ।