अप्रैल 2021

जाने वो 6 पेड़ जिनसे बनती है सबसे ज्‍यादा ऑक्‍सीजन, जो रखते हैं पर्यावरण को शुद्ध

भारत में इस समय कोविड-19 का कहर जारी है, ऑक्‍सीजन की कमी कई मरीजों की मौत की वजह बन रही है, इन सबके बीच ही जर्मनी से मोबाइल ऑक्‍सीजन प्‍लांट्स को एयरलिफ्ट करने और फाइटर जेट की टेक्‍नोलॉजी की मदद से ऑक्‍सीजन बनाने की खबरें आ रही हैं, लेकिन इन दोनों ही विकल्‍पों में यह बात सबसे अहम है कि आपके वातावरण में कितनी ऑक्‍सीजन है आइए उन पेड़ों के बारे में जानते हैं जो सबसे ज्‍यादा ऑक्‍सीजन जनरेट करते हैं…….
पर्यावरण के लिए वरदान हैं ये 6 पेड़:- ये वो 6 पेड़ हैं जो आपको अक्‍सर कहीं न कहीं दिख जाएंगे, आपके बगीचे में अगर ये पेड़ नहीं हैं तो तुरंत इन्‍हें लगाएं, ये आपको भी स्‍वस्‍थ रखेंगे और आपके वातावरण को भी….


1:-पीपल का पेड़:- हिंदु धर्म में पीपल तो बौद्ध धर्म में इसे बोधी ट्री के नाम से जानते हैं, कहते हैं कि इसी पेड़ के नीचे भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्‍त हुआ था,पीपल का पेड़ 60 से 80 फीट तक लंबा हो सकता है,यह पेड़ सबसे ज्‍यादा ऑक्‍सीजन देता है, इसलिए पर्यावरणविद पीपल का पेड़ लगाने के लिए बार-बार कहते हैं।


2:-बरगद का पेड़:- इस पेड़ को भारत का राष्‍ट्रीय वृक्ष भी कहते हैं,इसे हिंदू धर्म में बहुत पवित्र भी माना जाता है,बरगद का पेड़ बहुत लंबा हो सकता है और यह पेड़ कितनी ऑक्‍सीजन उत्‍पादित करता है ये उसकी छाया कितनी है, इस पर निर्भर करता है।


3:-नीम का पेड़:- एक और पेड़ जिसके बहुत से फायदे हैं, नीम का पेड़,इस पेड़ को एक एवरग्रीन पेड़ कहा जाता है और पर्यावरणविदों की मानें तो यह एक नैचुरल एयर प्‍यूरीफायर है,ये पेड़ प्रदूषित गैसों जैसे कार्बन डाई ऑक्‍साइड,सल्‍फर और नाइट्रोजन को हवा से ग्रहण करके पर्यावरण में ऑक्‍सीजन को छोड़ता है,इसकी पत्तियों की संरचना ऐसी होती है कि ये बड़ी मात्रा में ऑक्‍सीजन उत्‍पादित कर सकता है ऐसे में हमेशा ज्‍यादा से ज्‍यादा नीम के पेड़ लगाने की सलाह दी जाती है,इससे आसपास की हवा हमेशा शुद्ध रहती है।


4:-अशोक का पेड़:- अशोक का पेड़ न सिर्फ ऑक्‍सीजन उत्‍पादित करता है बल्कि इसके फूल पर्यावरण को सुंगधित रखते हैं और उसकी खूबसूरती को बढ़ाते हैं, यह एक छोटा सा पेड़ होता है जिसकी जड़ एकदम सीधी होती है, पर्यावरणविदों की मानें तो अशोक के पेड़ को लगाने से न केवल वातावरण शुद्ध रहता है बल्कि उसकी शोभा भी बढ़ती है, घर में अशोक का पेड़ हर बीमारी को दूर रखता है,ये पेड़ जहरीली गैसों के अलावा हवा के दूसरे दूषित कणों को भी सोख लेता है।


5:-अर्जुन का पेड़:- अर्जुन के पेड़ के बारे में कहते हैं कि यह हमेशा हरा-भरा रहता है,इसके बहुत से आर्युवेदिक फायदे हैं, इस पेड़ का धार्मिक महत्‍व भी बहुत है और कहते हैं कि ये माता सीता का पसंदीदा पेड़ था,हवा से कार्बन डाई ऑक्‍साइड और दूषित गैसों को सोख कर ये उन्‍हें ऑक्‍सीजन में बदल देता है।


6:-जामुन का पेड़:- भारतीय अध्‍यात्मिक कथाओं में भारत को जंबूद्वीप यानी जामुन की धरती के तौर पर भी कहा गया है,जामुन का पेड़ 50 से 100 फीट तक लंबा हो सकता है,इसके फल के अलावा यह पेड़ सल्‍फर ऑक्‍साइड और नाइट्रोजन जैसी जहरीली गैसों को हवा से सोख लेता है,इसके अलावा कई दूषित कणों को भी जामुन का पेड़ ग्रहण करता है।

नवरात्रि में माँ दुर्गा पूजन हेतु घट स्थापन अथवा पूजन कैसे करें ? विस्तार से हिंदी में


स्नानादि से निवृत्त होकर ऊंनी आसान पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठकर सर्वप्रथम गंगाजल ऊपर छिड़क कर तीन बार भगवान का नाम स्मरण करते हुए आचमन करें पुनः चंदन अक्षत पुष्प से पृथ्वी मैया का पूजन करें इसके बाद दीपक प्रज्वलित करें दीपक अपने बाय एवं देवताओं के दाहिने रहेगा दीपक का भी दीप देवतायै नमः इस मंत्र से चंदन पुष्प अक्षत से पूजन करें। फिर हाथ में अक्षत पुष्प लेकर अपने गुरुदेव भगवान माता पिता और अपने इष्ट देवता का स्मरण करें। फिर हाथ में जल अक्षत दूर्वा पुष्प फल और दक्षिणा रखकर संकल्प करें। संकल्प करते समय तीन बार भगवान विष्णु का नाम लें और बोलें आज इस पुण्य समय में भारतवर्ष के उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जनपद के (अपने गांव या मोहल्ले का नाम ले) ग्राम में आनंद नामक संवत्सर चैत्र मास शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि दिन मंगलवार को भगवती महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती के प्रसन्नता और कृपा प्राप्ति के लिए समस्त परिवार के कल्याण हेतु तथा दुर्गा देवी के प्रीति हेतु घट स्थापन तथा भगवान गणेश गौरी जी और कलश में भगवान वरुण गंगाद नदियां सप्तसागर और चारों वेद ब्रह्म विष्णु महेश का आवाहन तथा नवग्रह देवताओं का आवाहन तत्पश्चात भगवती का आवाहन कर यथा उपलब्ध सामग्री के द्वारा पूजन करूंगा। ऐसा बोलकर हाथ का अक्षत पुष्प सामने छोड़ दें। फिर गणेश जी गौरी जी के मूर्ति में अथवा सुपारी में रक्षा लपेटकर गणेश जी और गाय के गोबर का गौरी बनाकर ओम गं गणपतये नमः। ओम गौर्यै नमः आवाहयामि ऐसा बोलकर थोड़ा थोड़ा अक्षत गणेश गौरी जी के ऊपर छोड़ दें। गंगा जी के मिट्टी में जव बोकर उसके ऊपर कलश रखें कलश के गले में रक्षा बाधें कलश में सुपारी पैसा गंगा जी की मिट्टी दुर्गा अक्षत हल्दी गांठ सतावर और गंगाजल डालकर आम की टेरी डालकर प्याला या कटोरी में चावल भरकर कलश के मुख पर रखें और उस प्याले के ऊपर जलभरा नारियल में कपड़ा बांधकर रखें फिर हाथ में अक्षत लेकर ओम वं वरुणाय नमः, ओम गंगादि नदिभ्यो नमः, सप्तसागरेभ्यो नमः, सर्वान्तीर्थ्यो नमः, ब्रह्मणे नमः ,विष्णवे नमः, रुद्राय नमः, ऋग्वेदाय नमः यजुर्वेदाय नमः सामवेदाय नमः अथर्ववेदाय नमः,मातृभ्यो नमः आवाहयामि ऐसा बोलकर कलश के ऊपर डाल दें। कलश के बांयी तरफ किसी चौकी आदि में 16 जगह चावल का पुंज और दूसरे चौकी पर सात जगह चावल का पुंज रखें चौकी ना हो तो किसी प्याला या दियली में चावल भरकर सुपारी में रक्षा लपेटकर रखकर 16 पुंज वाले में ओम सगणेश षोडसमातृभ्यो नमः आवाहयामि ऐसा बोलकर चावल छोड़कर आवाहन करें। 7 पुंज वाले पर ओम सप्तघृत मातृभ्यो नमः आवाहयामि ऐसा बोलकर चावल छोड़कर आवाहन करें। फिर कलश के दाहिने तरफ किसी चौकी पर 9 जगह चावल रखें अथवा किसी प्याला या दियली में रक्षा लपेटकर सुपारी रखें और बाएं हाथ में चावल लेकर दाहिने हाथ से ओम सूर्याय नमः आवाहयामि, ॐ सोमाय नमः आवाहयामि, ओम मंगलाय नमः आवाहयामि, ओम बुद्धाय नमः आवाहयामि, ॐ बृहस्पतये नमः आवाहयामि, ॐ शुक्राय नमः आवाहयामि, ओम शनैश्चराय नमः आवाहयामि, ॐ राहवे नमः आवाहयामि, ओम केतवे नमः आवाहयामि ऐसा बोलते अक्षत छोड़ते जाएं। फिर देवी जी के मूर्ति आप फोटो के आगे हनुमान जी महाराज का आवाहन ओम हनुमते नमः आवाहयायि, देवी जी के मूर्ति या फोटो के पीछे ओम भैरवाय नमः आवाहयामि ऐसा बोलकर अक्षत छोड़ें। ओम नमः शिवाय बोलकर शंकर जी का ध्यान करें। ओम श्री विष्णवे नमः बोलकर भगवान नारायण का ध्यान करें और फिर हाथ में अक्षत पुष्प लेकर ओम श्री महाकाल्यै नमः, श्री महालक्ष्म्यै नमः, श्री महा सरस्वत्यै नमः आवाहयामि ऐसा बोलकर अथवा श्री दुर्गा देव्यै नमः आवाहयामि ऐसा बोलकर अक्षत पुष्प भगवती के ऊपर छोड़कर पूजन करें। भगवान गणेश जी और गौरी जी से शुरू कर सबको गंगाजल से स्नान वस्त्र के लिए रक्षा सूत्र जनेऊ फिर चंदन अक्षत पुष्प गणेश जी को दूब सभी देवताओं को बेलपत्र शमी पत्र नारायण जी को तुलसी पत्र चढ़ाएं अबीर रोली सिंदूर चढ़ाएं इत्र लगाएं धूप दिखाएं दीपक दिखाएं मिठाई फल पान सुपारी इलाइची लोंग चढ़ाकर भोग लगाएं आचमन करायें और दक्षिणा चढ़ाएं फिर हाथ में अक्षत पुष्प लेकर के गणेश गौरी सहित सभी देवताओं से नमस्कार प्रणाम प्रार्थना करें और भगवती से भी प्रार्थना करें कि आप मेरा पूजन स्वीकार करिए इसके बाद पाठ आदि करके आरती करें।
आपका मंगल हो भगवती की कृपा सपरिवार आप पर बनी रहे इसी मंगल कामना के साथ जय माता की।

शमी (खेजड़ी) वृक्ष का महत्त्व एवं पूजन विधि


शमी वृक्ष की पूजा करने के नियम
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स्नानोपरांत साफ कपड़े धारण करें। फिर प्रदोषकाल में शमी के पेड़ के पास जाकर सच्चे मन से प्रमाण कर उसकी जड़ को गंगा जल, नर्मदा का जल या शुद्ध जल चढ़ाएं। उसके बाद तेल या घी का दीपक जलाकर उसके नीचे अपने शस्त्र रख दें।
फिर पेड़ के साथ शस्त्रों को धूप, दीप, मिठाई चढ़ाकर आरती कर पंचोपचार अथवा षोडषोपचार पूजन करें। साथ ही हाथ जोड़ कर सच्चे मन से यह प्रार्थना करें।

‘शमी शम्यते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी।
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी।।
करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया।
तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता।।’

इसका अर्थ है- हे शमी वृक्ष आप पापों को नाश और दुश्मनों को हराने वाले है। आपने ही शक्तिशाली अर्जुन का धनुश धारण किया था। साथ ही आप प्रभु श्रीराम के अतिप्रिय है। ऐसे में आज हम भी आपकी पूजा कर रहे हैं। हम पर कृपा कर हमें सच्च व जीत के रास्ते पर चलने की प्रेरणा दें। साथ ही हमारी जीत के रास्ते पर आने वाली सभी बांधाओं को दूर कर हमें जीत दिलाए।

यह प्रार्थना करने के बाद अगर आपको पेड़ के पास कुछ पत्तियां गिरी मिलें तो उसे प्रसाद के तौर पर ग्रहण करें। साथ ही बाकी की पत्तियों को लाल रंग के कपड़े में बांधकर हमेशा के लिए अपने पास रखें। इससे आपके जीवन की परेशानियां दूर होने के साथ दुश्मनों से छुटकारा मिलेगा। इस बात का खास ध्यान रखें कि आपकी पेड़ से अपने आप गिरी पत्तियां उठानी है। खुद पेड़ से पत्तों को तोड़ने की गलती न करें।

शमी वृक्ष के गुण एवं महत्त्व
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शमी को गणेश जी का प्रिय वृक्ष माना जाता है और इसकी पत्तियाँ गणेश जी की पूजा में भी चढ़ाई जाती हैं। जिसमें शिव का वास भी माना गया है, जो श्री गणेश के पिता हैं और मानसिक क्लेशों से मुक्ति देने वाले देव हैं। यही कारण है कि शमी पत्र का चढ़ावा श्री गणेश की प्रसन्नता से बुद्धि को पवित्र कर मानसिक बल देने वाला माना गया है। अगर आप भी मन और परिवार को शांत और सुखी रखना चाहते हैं तो नीचे बताए विशेष मंत्र से श्री गणेश को शमी पत्र अर्पित करें –

त्वत्प्रियाणि सुपुष्पाणि कोमलानि शुभानि वै।
शमी दलानि हेरम्ब गृहाण गणनायक।।

शमी भगवान श्री राम का प्रिय वृक्ष था और लंका पर आक्रमण से पहले उन्होंने शमी वृक्ष की पूजा कर के उससे विजयी होने का आशीर्वाद प्राप्त किया था। आज भी कई स्थानों पर ‘रावण दहन’ के बाद घर लौटते समय शमी के पत्ते स्वर्ण के प्रतीक के रूप में एक दूसरे को बाँटने की प्रथा हैं, इसके साथ ही कार्यों में सफलता मिलने कि कामना की जाती है।

शमी शमयते पापं शमी शत्रु विनाशिनी।
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी।।
करिष्यमाणयात्राया यथाकालं सुखं मया।
तत्र निर्विघ्न कर्तृत्वं भवश्रीरामपूजिता।।

शमी पापों का नाश करने वाले और दुश्मनों को पराजित करने वाले है.अर्जुन का धनुष धारण करने वाले ; श्रीराम को प्रिय है.जिस तरह श्रीराम ने आपकी पूजा करी , हम भी करते है. अच्छाई की जीत में आने वाली सभी बाधाओं को दूर कर उसे सुखमय बना देते है।

यह वृक्ष जेठ के महीने में भी हरा रहता है। ऐसी गर्मी में जब रेगिस्तान में जानवरों के लिए धूप से बचने का कोई सहारा नहीं होता तब यह पेड़ छाया देता है। जब खाने को कुछ नहीं होता है तब यह चारा देता है, जो लूंग कहलाता है।

इसका फूल मींझर कहलाता है। इसका फल सांगरी कहलाता है, जिसकी सब्जी बनाई जाती है। यह फल सूखने पर खोखा कहलाता है जो सूखा मेवा है।

इसकी लकडी मजबूत होती है जो किसान के लिए जलाने और फर्नीचर बनाने के काम आती है। इसकी जड़ से हल बनता है।

वराहमिहिर के अनुसार जिस साल शमीवृक्ष ज्यादा फूलता-फलता है उस साल सूखे की स्थिति का निर्माण होता है। विजयादशमी के दिन इसकी पूजा करने का एक तात्पर्य यह भी है कि यह वृक्ष आने वाली कृषि विपत्ती का पहले से संकेत दे देता है जिससे किसान पहले से भी ज्यादा पुरुषार्थ करके आनेवाली विपत्ती से निजात पा सकता है।

अकाल के समय रेगिस्तान के आदमी और जानवरों का यही एक मात्र सहारा है। सन १८९९ में दुर्भिक्ष अकाल पड़ा था जिसको छपनिया अकाल कहते हैं, उस समय रेगिस्तान के लोग इस पेड़ के तनों के छिलके खाकर जिन्दा रहे थे।

इस पेड़ के नीचे अनाज की पैदावार ज्यादा होती है।

पांडवों द्वारा अज्ञातवास के अंतिम वर्ष में गांडीव धनुष इसी पेड़ में छुपाए जाने के उल्लेख मिलते हैं।

शमी या खेजड़ी के वृक्ष की लकड़ी यज्ञ की समिधा के लिए पवित्र मानी जाती है। वसन्त ऋतु में समिधा के लिए शमी की लकड़ी का प्रावधान किया गया है। इसी प्रकार वारों में शनिवार को शमी की समिधा का विशेष महत्त्व है।

शमी शनि ग्रह का पेड़ है. राजस्थान में सबसे अधिक होता है . छोटे तथा मोटे काँटों वाला भारी पेड़ होता है.

कृष्ण जन्मअष्टमी को इसकी पूजा की जाती है . बिस्नोई समाज ने इस पेड़ के काटे जाने पर कई लोगों ने अपनी जान दे दी थी।

कहा जाता है कि इसके लकड़ी के भीतर विशेष आग होती है जो रगड़ने पर निकलती है. इसे शिंबा; सफेद कीकर भी कहते हैं।

घर के ईशान में आंवला वृक्ष, उत्तर में शमी (खेजड़ी), वायव्य में बेल (बिल्व वृक्ष) तथा दक्षिण में गूलर वृक्ष लगाने को शुभ माना गया है।

कवि कालिदास ने शमी के वृक्ष के नीचे बैठ कर तपस्या कर के ही ज्ञान की प्राप्ति की थी।

ऋग्वेद के अनुसार आदिम काल में सबसे पहली बार पुरुओं ने शमी और पीपल की टहनियों को रगड़ कर ही आग पैदा की थी।

कवियों और लेखकों के लिये शमी बड़ा महत्व रखता है। भगवान चित्रगुप्त को शब्दों और लेखनी का देवता माना जाता है और शब्द-साधक यम-द्वितीया को यथा-संभव शमी के पेड़ के नीचे उसकी पत्तियों से उनकी पूजा करते हैं।

नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा भी शमी वृक्ष के पत्तों से करने का शास्त्र में विधान है। इस दिन शाम को वृक्ष का पूजन करने से आरोग्य व धन की प्राप्ति होती है।कहते है एक आक के फूल को शिवजी पर चढ़ाना से सोने के दान के बराबर फल देता है , हज़ार आक के फूलों कि अपेक्षा एक कनेर का फूल, हज़ार कनेर के फूलों के चढाने कि अपेक्षा एक बिल्व-पत्र से मिल जाता है। हजार बिल्वपत्रों के बराबर एक द्रोण या गूमा फूल फलदायी। हजार गूमा के बराबर एक चिचिड़ा, हजार चिचिड़ा के बराबर एक कुश का फूल, हजार कुश फूलों के बराबर एक शमी का पत्ता, हजार शमी के पत्तो के बराबर एक नीलकमल, हजार नीलकमल से ज्यादा एक धतूरा और हजार धतूरों से भी ज्यादा एक शमी का फूल शुभ और पुण्य देने वाला होता है। इसलिए भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए एक शमी का पुष्प चढ़ाएं क्योंकि यह फूल शुभ और पुण्य देने वाला होता है।

इसमें औषधीय गुण भी है. यह कफनाशक ,मासिक धर्म की समस्याओं को दूर करने वाला और प्रसव पीड़ा का निवारण करने वाला पौधा है. शन्नोदेवीरभीष्टय आपो भवन्तु पीतये
शन्नोदेवीरभीष्टय

शमी पोधे की पूजा करने से आपको क्या क्या लाभ मिलता है।
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शमी शनिदेव को प्रिय है इसलिए शमी की पूजा सेवा करने से शनि की कृपा प्राप्त होती है और समस्त संकटों का नाश होता है।

आइये जानते हैं शमी के पौधे के क्या-क्या उपाय किए जा सकते हैं:
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यदि परिवार में धन का अभाव बना हुआ है। खूब मेहनत करने के बाद भी धन की कमी है और खर्च अधिक है तो किसी शुभ दिन शमी का पौधा खरीदकर घर ले आएं। शनिवार के दिन प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर नए गमले में शुद्ध मिट्टी भरकर शमी का पौधा लगा दें। इसके बाद शमी पौधे की जड़ में एक पूजा की सुपारी. अक्षत पौधे पर गंगाजल अर्पित करें और पूजन करें। पौधे में रोज पानी डालें और शाम के समय उसके समीप एक दीपक लगाएं। आप स्वयं देखेंगे धीरे-धीरे आपके खर्च में कमी आने लगेगी और धन संचय होने लगेगा।

शनिवार को शाम के समय शमी के पौधे के गमले में पत्थर या किसी भी धातु का एक छोटा सा शिवलिंग स्थापित करें। शिवलिंग पर दूध अर्पित करें और विधि-विधान से पूजन करने के बाद महामृत्युंजय मंत्र की एक माला जाप करें। इससे स्वयं या परिवार में किसी को भी कोई रोग होगा तो वह ल्दी ही दूर हो जाएगा।

कई सारे युवक-युवतियों के विवाह में बाधा आती है। विवाह में बाधा आने का एक कारण जन्मकुंडली में शनि का दूषित होना भी है। किसी भी शनिवार से प्रारंभ करते हुए लगातार 45 दिनों तक शाम के समय शमी के पौधे में घी का दीपक लगाएं और सिंदूर से पूजन करें। इस दौरान अपने शीघ्र विवाह की कामना व्यक्त करें। इससे शनि दोष समाप्त होगा और विवाह में आ रही बाधाएं समाप्त होंगी।

जन्मकुंडली में यदि शनि से संबंधित कोई भी दोष है तो शमी के पौधे को घर में लगाना और प्रतिदिन उसकी सेवा-पूजा करने से शनि की पीड़ा समाप्त होती है।

जिन लोगों को शनि की साढ़े साती या ढैया चल रहा हो उन्हें नियमित रूप से शमी के पौधे की देखभाल करना चाहिए। उसमें रोज पानी डालें, उसके समीप शाम के समय दीपक लगाएं। शनिवार को पौधे में थोड़े से काले तिल और काले उड़द अर्पित करें। इससे शनि की साढ़ेसाती का दुष्प्रभाव कम होता।

यदि आप बार-बार दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हों तो शमी के पौधे के नियमित दर्शन से दुर्घटनाएं रुकती हैं।